तेरी कौन सी बात है
जो घर कर गई है मुझमें
खुरच खुरच के निकालती हूँ
फिर भी तेरी यादें जाती हैं ही नहीं...
जो नाम तूने लिया था मेरा
तो मेरा नाम खास हो गया
गर्व होने लगा मेरे नाम पर
कि मुझ सा नामी कोई है ही नहीं...
तेरी छुअन से पिघलती
कठोर बर्फ का टुकड़ा थी मैं
और तूने समझा चट्टान
कि मुझसा हार्ड कोई है ही नहीं...
किस्मत ने मेरे प्यार की इम्तहां ली थी
और खुदा ने भी फेल कर
साबित कर दिया कि
मुझ सा फेलियर कोई है ही नहीं...
सोचती हूँ
सोचती हूँ ग़र तू मुझे
मिल गया होता तो क्या होता
क्या तब भी प्यार मेरा
इतना ही गहरा होता
क्या तबभी मैं तेरे लिए
इतना ही तड़प रही होती
क्या तब भी दिल तुझे पाने की
मन्नतें माँग रहा होता
या खो गए होते हम
एक दूजे के प्यार में
या बढ़ चुकी होती दूरियाँ
हम दोनों की तकरार में
या ऊब रहा होता तू
मुझसे मेरे प्यार से
या पक चुकी होती मैं
तेरे हर इनकार से
तब तो अच्छा हुआ
जो तू नहीं मिला
तुझे खोने के सिवा
कोई और नहीं गिला
तुझसे चाहत मेरी
अब तक वैसी ही स्वच्छ है
बस सदियों तक चलता रहे
ऐसा ही सिलसिला...
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