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Friday, 27 December 2019

Love shayries

अभिषेक अभिराम अभिमान था मेरा
बचपन से सजाया वो अरमान था मेरा।
चंद लमहों में दुनिया विरान हो गई
शायद यही ज़िन्दगी का इम्तहान था मेरा।।

अब हाल मेरा कोई क्या पूछे
कोई तो मुझमें मुझको ढूढे
खोई हूँ कबसे पता नहीं
कब शाम ढली कब दिन डूबे।

जोगन सी फिरती भटकूँ विरही
कोई आस नहीं कोई राह नहीं
कबसे मंजिल भी मेरी गुम हुई है
दिल में भी जीने की कोई चाह नहीं

हर रूप तेरा मैंने देख लिया
क्या कहूँ के कैसा रोग लिया
जो जानती मैं तेरी मंशा
करती ना कभी जो अभी किया।।

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