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Monday, 14 October 2019

अब परिवर्तन चाहिए

अब परिवर्तन चाहिए


सिर्फ शरीर नहीं थी रे मैं

मुझमें भी तुझसी चेतना है।
मैं माँ बेटी बहन थी तेरी
फिर दिल में कैसी वेदना है।।

जन्मदात्री इस दुनिया की

धरती सा सौभाग्य मेरा।
अंकुरण की छमता है मुझमें
और यही बना दुर्भाग्य मेरा।।

अगर लेना हो बदला मुझसे

और दिखाना हो नीचा।
शरीर मेरा एकमात्र विकल्प
तेरा कोई हाथियार न दूजा।।

गर लड़ते दिमाक से मुझसे

तो बराबर टक्कर देती।
शक्ति से जो लड़ते तुम तो
दमभर अपने कोशिश करती।।

पर तुमने जो राह चुनी

क्या शक्ति बुद्धि से हीन हुए।
क्या बर्बरता के चरम शिखर पर
कायरता के आधीन हुए।।

थप्पड़ का बदला थप्पड़ हो

गाली का बदला गाली।
पर बलात्कार है किसका बदला
ये बात समझ ना आई।।

सीरियल्स में देखा है मैंने

हाथ पकड़ते सरे राह सभी।
होती फिर हीरो की एंट्री
गुण्डे जाते भाग सभी।।

हकीकत की दुनिया में तो

कभी न हीरो आता है।
ग़र कोई कोशिश भी करे
तो राहों में फिक जाता है।।

यहाँ तो हीरो होते ही नहीं

जो गुण्डों से बचाए कभी।
ग़र होते हीरो भी यहाँ
न होतीं रेप सी सजाएं कभी।।

बात खत्म नहीं है यहीं

हर सौदे का सौदागर स्त्री।
बिकती सरे राह नज़रों से देखो
हर घर की इज्जत और लक्ष्मी।।

सौदा हो तो शरीर से करना

बदला भी शरीर से लेना।
नीचा भी शरीर गिराती
बेइज्जती भी शरीर की होती।।

वजह क्या होती रेप के पीछे

कामुकता या बदला।
माँ बहन को देख के फिर
क्यूं नहीं जागती भावना।
और बदला शरीर से ही क्यूँ
कोई कुछ तो कहो ना।।

क्या पुरुषत्व नष्ट हो गया

या नष्ट हो गई चेतना।
या मर्द हो गया है कायर
या भूल गया है लड़ना।।

सुन्दरता का प्रतीक है स्त्री

माना गुलाब का फूल है स्त्री।
फूल तो डाली पर खिलते हैं
सुगन्ध बिखेर हिलते डुलते हैं।।

ग़र सोचो कोई तोड़ के मसल दिया तो

छण भर को महकेंगे हाथ।
गुलाब का स्तित्व मिट जाएगा
कुछ ना बचेगा उसके पास।।

मिट्टी तो होना था एक दिन

पर ऐसे मसले जाना।
बर्बरता की हद ही तो है
यह रूप ना कोई पहचाना।।

सुन्दर हूँ आँखों में भर लो

मन में और यादों में रख लो।
शरीर मेरा कोई वस्तु नहीं
जिसका तुम सौदा कर लो।।

आधी आबादी तुम भी हो

आधी ही आबादी मैं भी हूँ
न तुम शरीर न मैं शरीर
समझो इंसान ही मैं भी हूँ।।

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